सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

2011 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

बदल गए पत्रकारिता के माएने

मनीष अस्थाना पिछले कई सालों से पत्रकारिता के मायने लगातार बदलते हये दिखाई दे रहें है , मायने बदलने से तात्पर्य यह है कि पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी लेकिन आज पत्रकारिता पूरी तरह से कमर्सियल हो चुकी है आज पत्रकारिता का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है । पत्रकारिता के दुरउपयोग के लिए सिर्फ मीडिया प्रबंधन को ही दोषी ठ्हराना गलत होगा बल्कि इसके लिए पत्रकारिता जगत वे मठाधीश भी जिम्मेदार है जो बड़े बड़े पदों पर विराजमान हैं। येसे लोग जो मात्र अपनी कुर्सी बचाने के लिए या तो प्रबंधन या फिर मालिक कि दिनरात चाटुकारिता करते राहतें हैं , येसे लोग ही पत्रकारिता से जुड़े लोगों का जमके शोसन करते रहते हैं । वैसे पत्रकारों का शोसन होना कोई नई बात नहीं है यह बात किसी से छिपी भी नहीं है अब हालत तो यह है कि एक अखबार के पाठक को यह बात पता होती है कि अखबार का प्रबंधन किस कदर पत्रकारों का शोसन करते है इसी बात का फायदा राजनीति से जुड़े लोग उठाते है शायद लिफाफा देने तथा लेने का चलन इसी कि वजह से शुरू हुआ है । आज ईमानदार व साफ सूत्री छवि वाले पत्रकारों को जल्दी से कोई नौकरी नहीं देना चाहता है और कोई संस्था...