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बदल गए पत्रकारिता के माएने

मनीष अस्थाना
पिछले कई सालों से पत्रकारिता के मायने लगातार बदलते हये दिखाई दे रहें है , मायने बदलने से तात्पर्य यह है कि पहले पत्रकारिता एक मिशन हुआ करती थी लेकिन आज पत्रकारिता पूरी तरह से कमर्सियल हो चुकी है आज पत्रकारिता का खुलेआम दुरुपयोग किया जा रहा है ।
पत्रकारिता के दुरउपयोग के लिए सिर्फ मीडिया प्रबंधन को ही दोषी ठ्हराना गलत होगा बल्कि इसके लिए पत्रकारिता जगत वे मठाधीश भी जिम्मेदार है जो बड़े बड़े पदों पर विराजमान हैं। येसे लोग जो मात्र अपनी कुर्सी बचाने के लिए या तो प्रबंधन या फिर मालिक कि दिनरात चाटुकारिता करते राहतें हैं , येसे लोग ही पत्रकारिता से जुड़े लोगों का जमके शोसन करते रहते हैं ।
वैसे पत्रकारों का शोसन होना कोई नई बात नहीं है यह बात किसी से छिपी भी नहीं है अब हालत तो यह है कि एक अखबार के पाठक को यह बात पता होती है कि अखबार का प्रबंधन किस कदर पत्रकारों का शोसन करते है इसी बात का फायदा राजनीति से जुड़े लोग उठाते है शायद लिफाफा देने तथा लेने का चलन इसी कि वजह से शुरू हुआ है । आज ईमानदार व साफ सूत्री छवि वाले पत्रकारों को जल्दी से कोई नौकरी नहीं देना चाहता है और कोई संस्थान अपने यहाँ नौकरी देना भी चाहता है तो उसकी मंशा यही होती है कि इस व्यक्ति का दोहन किस तरीके से किया जाय।
आज से कुछ साल पहले तक जो व्यक्ति संपादकीय विभाग से जुड़ता था तो उसे सिर्फ समाचारों को सुधारने का ही कहा जाता था फील्ड मैं काम करने वाले सवाददाता को शिर्फ अछी खबरें लाने के लिए कहा जाता था ताकि समाचार पत्र से अधिक से अधिक जुड़ सके , लेकिन आज कि पत्रकारिता के मायने ही बदल दिये गए है पद के हिसाब से उसे बिज्ञापन का टार्गेट दिया जाता है । शायद इसी लिए जब किसी व्यक्ति को बुलाया जाता है तो सबसे पहले उससे यही पूछा जाता है कि वह कितना फाइदा कंपनी को कार्वा सकता है उसी के आधार पर उसका वेतन तय किया जाता है यानि कि उसे पत्रकारिता के साथ साथ मार्केटिंग का काम भी करना होता ऐसे ईमानदार पत्रकारिता के बारे मे सोचना भी बेईमानी ही होगा । यदि कोई व्यक्ति यह सब करने मे सक्छ्म नहीं होता है तो उसे चलता कर दिया जाता है भले ही वह कितना ही योग्य क्यों न हो ।
मुझे आज भी याद है जब मुंबई से प्रकाशित होने वाले एक हिन्दी अखबार ने एक संपादक के स्तर वाले व्यक्ति को सिर्फ मानसिक रूप से प्रताड़ित करने के लिए एक महीने मैं 5 लाख का विज्ञापन लाने के लिए कहा था जब उनसे यह काम नहीं हुआ तो उन्हें संस्थान से चलता कर दिया गया ।
आज हालत यह है कि संपादकीय विभाग से जुड़े हर व्यक्ति का दोहन किया जाता है । एसे मे हर व्यक्ति विज्ञापन के टार्गेट को पूरा करने मे जूटा रहता है चाहे वह विज्ञापन कि सक्ल मैं हो या फिर पेड न्यूज़ कि शक्ल मैं ।
अखबार का प्रबंधन पैसों के लिए इस कदर अंधा हो जाता है कि उसे किसी व्यक्ति के चरित्र से भी कुछ लेना देना नहीं रहता है ।
कुछ दिनों पहले समाचार पत्रों में टेजे से बढ़ रहे पेड न्यूज़ के चलन पर चिंता व्यक्त की गई है और आल भी व्यक्त की जा रही है यहाँ पेड न्वेस को लेकर कूद इलैक्शन कमीशन ने भी चिंता जताई थी और इसके लिए एक गाइड लाइन बनाने की ब्बत तक काही थी ।
पत्रकारिता को मोहरा बनाकर की जाने वाली वसूली से जहां एक ओर पत्रकारिता जगत को बदनामी झेलनी पड़ रही है वहीं दूसरी ओर अखबारों की विसवासनीयता को भी बट्टा लगा है । पहले पाठक अखबार मे प्रकाशित खबर पर आँख मूँद कर विसवास कर लेता था लेकिन वही पाठक आज नहीं करता है अब पाठक वर्ग का नजरिया बादल गया है अखबार मे प्रकासित समाचार की सच्चाई पर सहज ही विसवास नहीं करता है उसे लगता है की अखबार मे प्रकाशित खबर कही झूठी तो नहीं है ,यदि किसी व्यक्ति के बारें मे कुछ प्रकाशित किया जाता है पाठक सहज ही कहता है की यह तो पेसा देकर छपवाया गया होगा दुर्भाग्य से होता भी एसा ही है ।
एसा नहीं की यह सब पाठक वर्ग ने अपने मन से सोचना सुरू किया है बल्कि यह सब उसे सोचने के लिए अखबारों ने ही विवश किया है । क्योंकि आल के अखबारों ने पेसा लेकर किसे असामाजिक व्यक्ति को भी समाजसेवक का प्रमाणपत्र आसानी से दे देते हैं
इधर भाषाई अखबारों में काम करने वाले प्रबुद्ध लोगों ने अपना नजरिया ही बादल लिया है और समय के साथ चलने की बात कह कर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं ।
लेकिन यहाँ पर सबसे अहम सवाल यह है की जब समाचार पत्र पाठक की विस्वस्नीयता पर ही खरा नहीं है तो फिर भला एसे संस्थान के साथ जुड़कर काम करने से क्या लाभ ?

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