सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हिंसक आरक्षण आंदोलन का जिम्मेदार कौन ? क्या आरक्षण से सुलझ जाएगी बेकारी की समस्या

मनीष अस्थाना
पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र में आरक्षण का मुद्दा मराठा समाज मे सिर चढ़कर बोल रहा है , मराठा समाज ने इसके लिए हिंसा का रास्ता भी अख्तियार किया जो आज भी रुकने का नाम नहीं ले रहा है । पिछले दिनों हुई हिंसा में सरकारी और निजी संपत्ति को जमकर नुकसान पहुचाने का काम किया गया । आंदोलन कोई भी हो लोगों की मांगें कितनी भी गंभीर क्यों न हो हिंसा के रास्ते को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है । महाराष्ट्र में पिछले दिनों जिस तरह से हिंसक आंदोलन हुआ उसके लिए हकीकत में जिम्मेदार कौन है यह सबसे बड़ा सवाल है ? मात्र आंदोलन खत्म होने से ही चिंता खत्म नहीं होनी चाहिए क्योंकि यह मामला सिर्फ आंदोलन तक ही नहीं सीमित है इस आंदोलन से युवाओं की हिंसक मानसिकता भी उजागर हुई है जो सरकार और समाज दोनों के लिए चिंता का विषय है ।
इस आंदोलन में एक बात साफ साफ उजागर हुई है कि अपनी मांग को मनवाने के लिए आज का युवा किसी भी हद तक जा सकता युवा चाहे महाराष्ट्र के हो या फिर कश्मीर के या फिर किसी दूसरे राज्य के ही क्यों न हो सुरक्षा बलों से टकराने में उन्हें कोई गुरेज नहीं और न ही उसके परिणामों से । कश्मीर के युवा आजादी के नाम पर सेना के जवानों पर पथराव करते हुए दिखाई देते है उसी तरह आंदोलन में भाग लेने वाले युवा सुरक्षा बलों के जवानों पर पथराव करते हुए ऐसे नजर आते है जैसे यह कोई सामान्य बात हो । सरकारी संपत्ति का इस तरह से नुकसान करते है जैसे उस संपत्ति से उनका कोई सरोकार ही नहीं है वे निजी संपत्ति को जलाने या तोड़ने फोड़ने में तनिक भी संकोच नहीं करते है ।
आज जो भी लोग आरक्षण की मांग कर रहे है यदि उन्हें आरक्षण दे भी दिया जाता है तो क्या उस समाज मे बेरोजगारी की समस्या हल हो जाएगी ? यदि ऐसा होता तो आज जिन जिन लोगों को आरक्षण मिला हुआ है उस समाज के युवा बेरोजगार नहीं होते लेकिन जिस जिस समाज को आरक्षण मिला हुआ उस समाज मे आरक्षण के बावजूद बेकारी की समस्या देखी जा सकती है । आज सरकारी नौकरियों में आरक्षण लेने के लिए आंदोलन किये जा रहे है लेकिन सरकारी नौकरियां उतनी नहीं है जितने देश मे युवा बेरोजगार हैं । आज के डिजिटल युग मे निजी क्षेत्रों में नौकरियों के हजारों विकल्प खुले हैं लेकिन निजी क्षेत्रों में कोई नौकरी करना नहीं चाहता है ऊपर से सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग की जाने लगती है ।
देश के युवा बेरोजगार न रहें इसके लिए केंद्र सरकार की कई तरह की योजनाएं है , युवाओं को रोजगार उपलब्ध हो इसके लिए सरकार लगातार प्रयास कर रही है लेकिन लोगों की मानसिकता बनी हुई है कि सरकारी नौकरी करो और ऐश की जिंदगी गुज़ारो जबकि स्व रोजगार में अधिक मेहनत और काम करने की इच्छा शक्ति की जरूरत होती है जो आरक्षण मांगने वाले युवाओं में कहीं भी नजर नहीं आती है । जो भी व्यक्ति आरक्षण का हिमायती है हर उस व्यक्ति का अपना स्वार्थ है हमारे नेतागण युवाओं को स्वालंबी बनाने के बजाय उस पर राजनीति कर अपने वोट बैंक को पक्का करने में लगे हुए है लेकिन आरक्षण की मांग करने वालों को यह बात समझ में नहीं आती है ।
अक्सर देखा जाता है कि जब कोई आंदोलन होता है जब कोई आंदोलन होता है उसके पीछे कोई छिपी हुई ताकत काम कर रही है उस ताकत का अपना स्वार्थ होता है उसी स्वार्थ के युवाओं को वह कठपुतली की तरह अपने इशारों पर नचाने का काम करते है । यदि ऐसा न होता तो बेरोजगारी को दूर करने के लिए कई अन्य मार्ग भी है यह लोग युवाओं को उस मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते हैं ? आखिर यह लोग युवाओं को गुमराह करने का काम क्यों करते हैं ? युवाओं को भी ऐसे स्वार्थी लोगों के स्वार्थ को समझने की जरूरत है यह लोग युवाओं को हिंसक रास्ते पर ले जाने का कार्य तो कर सकते है और कर भी रहें है लेकिन स्वालंबी बनाने का कार्य कदापि नहीं कर सकते इसलिए ऐसे स्वार्थी तत्वों से सावधान रहने की जरूरत है ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

जिन्ना का जिन्न मचा रहा उत्पात

जिन्ना का जिन्न फिर मचा रहा है उत्पात जिन्ना की विचारधारा वाले नहीं हो सकते हैं राष्ट्रभक्त मनीष अस्थाना आजादी के बाद जिस तरीके से मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत के विभाजन में महत्वपूर्ण किरदार निभाते हुए भारत का विभाजन कराया था उस इतिहास को हिंदुस्तान कभी नहीं भूल सकता है । मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की नींव लाखों निर्दोष लोगों की लाशों पर रखी थी । आजादी के बाद जिन्न एक बार फिर आजाद हिंदुस्तान की सड़कों पर खुले आम उत्पात मचा रहा है । यह मामला है अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का यहां पर जिन्ना की तस्वीर लगी हुई है , जिन्ना की यह तस्वीर यहां क्यूँ लगाई गई है इस बारे वहां के सांसद ने कुलपति को एक पत्र लिखा था उन्होंने पत्र में जिन्ना की तस्वीर को हटाने की मांग भी की । विश्वविद्यालय से तस्वीर हटाई जाय इसके लिए हिन्दू युवा वाहिनी ने आंदोलन छेड़ रखा है जिसकी वजह से हिन्दू युवा वाहिनी के सदस्यों तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के छात्र संघ के तीखी झड़प हुई इसके अलीगढ़ में इतना अधिक तनाव बढ़ गया कि पुलिस के अलावा रैपिड एक्सन फोर्स तक मांगनी पड़ी । इसके साथ ही राजनीतिक हलकों से लेकर...

आखिर क्या है कर्नाटक चुनाव परिणाम के मायने ?

किसी को भी नहीं मिला पूर्ण बहुमत मनीष अस्थाना मंगलवार के दिन कर्नाटक चुनाव के परिणाम घोषित हो गए , लेकिन यह चुनाव परिणाम किसी भी राजनीतिक दल की उम्मीदों पर खरे साबित नहीं हुए चुनाव परिणाम आने से पहले भाजपा को पूरी उम्मीद थी कि उसे 120 के आसपास सीटें मिलेगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ भाजपा की सीटें बढ़ीं तो जरूर लेकिन बहुमत का आंकड़ा पार नहीं कर पायी भाजपा यहां पर 104 सीटें ही हासिल कर पाई इसी तरह कर्नाटक में कांग्रेस का दावा भी खोखला ही साबित हुआ वह अपनी सरकार तक नहीं बचा पायी कांग्रेस मात्र 78 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी । जैसा कि राजनीतिक जानकारों का अनुमान था कि यहां पर जेडीएस सरकार बनाने के लिए किंग मेकर की भूमिका में आ सकता है और वही हुआ भी , कर्नाटक में जेडीएस को किंग की भूमिका में आने का मसुक मिला । चुनाव परिणाम घोषित होने से पहले इस बात के कयास लगाए जा रहे थे कि यदि भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला तो वह जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बना लेगी लेकिन चुनाव परिणामों के बीच में ही कांग्रेस ने एक ऐसा कार्ड खेला जिसकी उम्मीद कम की जा रही थी , कांग्रेस ने जेडीएस नेताओं से मिलकर कहा कि वे सरकार...

दलित अब कहाँ रहे अछूत

दलित अब अछूत कहाँ रहें सिर्फ वोट बैंक के लिए हो रही है राजनीति मनीष अस्थाना देश मे जो लोग वोट बैंक पक्का करने के लिए दलित के नाम की राजनीति कर रहें है उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि दलित अब अछूत नहीं रहें एक समय था जब सवर्ण लोग दलितों को अछूत मानते थे और उनके यहां पानी पीने तक नहीं पीते थे लेकिन अब ऐसा नही है दलित और सवर्ण एक साथ काम करते है और एक मेज पर बैठकर खाना भी कहते है हां देश के नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए दलित समाज को बाकी के लोगों से अलग कर रखा है दलित समाज के जो लोग पिछड़े हैं और गरीब भी है जो इन नेताओं की राजनीति नहीं समझते हैं उनके मन मे जहर घोलने का काम करते रहते है उन्हें लगातार इस बात का आभाष दिलाते रहतें है कि वे एक समाज का हिस्सा है जिसे पिछड़ा माना जाता है वे बाकी से अलग है । दलित समाज के मन मे सबसे अधिक जहर घोलने का काम दलित नेता ही करते है । अपने आप को दलित समाज का हितैषी कहने वाली मायावती ने दलित मतदाताओं के बल पर सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गई वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनी लेकिन गरीब दलितों का उत्थान नहीं कर पाई । आज जिस तरीके अमीर और गरीब सवर...