सिर्फ सत्ता सुख ही है नेताओं की विचारधारा
मनीष अस्थाना
चुनाव आते ही राजनीतिक दलों में बड़ी उठापटक शुरू हो जाती है , बात जब सत्ता सुख की आती है तब हर नेता के समक्ष पार्टी की विचारधारा बौनी साबित हो जाती है। यह बात किसी एक नेता पर नहीं बल्कि देश के अधिकांश नेताओं पर लागू होती है। कुछ दिनों बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं यहां पर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस भाजपा और शिवसेना में शामिल हो रहें हैं इसमें से कई लोग तो ऐसे है जो शिवसेना और भाजपा को दिन रात पानी पी - पी कर कोसते दिखाई देते थे , जो लोग कभी विचारों की दुहाई देते थे आज उन्ही लोगों को अपनी उसी विचारधारा का जहाज डूबता दिखाई देने लगा है ऐसे लोग अब उस जहाज की सवारी करना चाह रहें जो पानी की सतह से दो फ़ीट ऊँचा चलता दिखाई दे रहा है। यह लोग अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए किसी भी स्तर तक जाते हुए दिखाई दे रहें हैं।
यह बात सिर्फ महाराष्ट्र के नेताओं पर ही लागू नहीं होती है बल्कि उन राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है जो मौका परस्ती के चलते सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। अभी लोकसभा चुनाव को बीते कुछ अधिक दिन नहीं हुए हैं जिसमें उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन देखने को मिला जो मौका परस्ती को ही दर्शाती है।
इन दिनों महाराष्ट्र में सबसे अधिक मौका परस्ती देखने को मिल रही है, कांग्रेस और एनसीपी के एक से एक दिग्गज नेताओं को अब ऐसे आभाष होने लगा है कि अब भाजपा में ही उनका बेडा पार हो सकता है भाजपा में शामिल होने के बाद ही उनका राजनीतिक भविष्य संवर सकता है ऐसे लोग अपने पूरे परिवार के साथ भाजपा और शिवसेना में शामिल हो रहें हैं। ऐसे नेताओं को जन भावनाओं से कोई लेना देना नहीं।
महाराष्ट्र में भाजपा हर कीमत पर शिवसेना से अधिक सीटें लाना चाहती है इसलिए वह कांग्रेस - एनसीपी के उन दिग्गजों में यह सोचकर पार्टी में शामिल कर रही है कि उनके जरिये भाजपा विधानसभा में अपनी सीटों के नंबर बढ़ा लेगी। ख़ैर ! हो सकता हो की दोनों दलों के नेताओं का सोचना सही हो लेकिन आने वाले दिनों में भाजपा के सामने क्या परिवारवाद की समस्या खड़ी नहीं हो जाएगी ? यहाँ पर एक उदाहरण देना जरुरी है , अभी कुछ दिनों पहले नवी मुंबई के दिग्गज नेता अपने दल बल और अपने पूरे परिवार के साथ भाजपा में शामिल हुए हैं गणेश नाईक का अभी तक का इतिहास रहा है कि जब से नवी मुंबई महानगर पालिका का गठन हुआ है तब से ही मनपा में परिवार वाद ही हावी रहा।
नवी मुंबई मनपा के पहले महापौर संजीव नाईक हुए सबसे कम उम्र के थे जिन्हे महापौर सिर्फ इसलिए बनाया गया कि एक रिकार्ड बनाया जा सके उसके बाद मनपा के शीर्ष पदों पर उनके परिवार का सदस्य या उनका कोई चहेता ही विराजमान हुआ जिस समय नवी मुंबई मनपा का गठन हुआ था उस समय गणेश नाईक शिवसेना में थे। उसके बाद गणेश नाईक एनसीपी में शामिल हुए , एनसीपी में गणेश नाइक एक कद्दावर नेता के रूप में जाने जाते थे इसीलिए उन्होंने ठाणे लोकसभा सीट से अपने बड़े पुत्र संजीव नाईक को लोकसभा का टिकट दिलवाने में कामयाब हुए इसके साथ ही अपने छोटे पुत्र संदीप नाईक को ऐरोली विधानसभा सीट से एनसीपी का टिकट दिलवाया जबकि वे खुद बेलापुर सीट से चुनाव लड़ा था।
इस बार नवी मुंबई में कुछ वैसी ही परिस्थित निर्मित होती दिखाई दे रही है यानि कि ऐरोली विधानसभा सीट से संदीप नाइक को भाजपा टिकट देगी क्योकि वे वर्तमान विधायक है और एनसीपी छोड़कर भाजपा में आये है इसके साथ ही बेलापुर से गणेश नाईक इसलिए प्रबल दावेदार हैं क्योंकि उन्होंने भाजपा को बैठे बिठाये नवी मुंबई मनपा में सत्ता स्थापित करवा दी। यानि कि बेलापुर की वर्तमान विधायक मंदा म्हात्रे का पत्ता साफ़ ? इसके बाद आने वाले समय में संजीव नाईक ठाणे लोकसभा सीट के प्रबल दावेदार माने जाएंगे ? जिसका सीधा मतलब भाजपा के जो नेता परिवार वाद का विरोध करते आएं हैं वे जाने अनजाने में परिवार वाद को ही बढ़ावा देने का काम कर रहें हैं क्योंकि महाराष्ट्र में एक अकेला गणेश नाइक परिवार ही नहीं है जो भाजपा में शामिल हुआ हो बल्कि कई ऐसे और भी नेता है जो परिवार के साथ भाजपा में शामिल हुए हैं।
आने वाले दिनों में यही परिवार भाजपा के लिए किसी चुनौती से कम नहीं होंगे क्योंकि यह लोग किसी विचारधारा को नहीं मानते बल्कि सत्ता सुख ही इनकी विचारधारा है।
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