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क्या पवार के चक्र व्यूह में उलझ गई महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार


क्या पवार के चक्रव्युह में उलझ गयी महाराष्ट्र की बीजेपी सरकार ?

मनीष अस्थाना

      महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के साथ ही एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने जिस तरह बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देने की बात कही थी उससे इस प्रकार की चर्चा की जाने लगी थी कि 15 साल के भीतर एनसीपी के मंत्रियों ने जो घोटाले किए है उन लोगों को बचाने के लिए शरद पवार ने महाराष्ट्र में बीजेपी को अपना समर्थन देने की बात कह रहें है । उधर बीजेपी के नेता पवार के बिना शर्त समर्थन दिये जाने की वजह बीजेपी के कुछ नेता शिवसेना को लगातार राजनीतिक स्तर पर नीचा दिखाने  का प्रयास करने में लगे हुये थे । हालांकि एनसीपी के समर्थन को लेकर बीजेपी का कोई भी नेता बोलने के लिए न तब तैयार था और न ही अब कोई खुलकर बोल रहा है । लेकिन जिस दिन विधानसभा में बीजेपी को विश्वास मत हासिल करना था उस दिन कुछ नेता यह बोलते हुये जरूर दिखाई दिये कि हमने एनसीपी से समर्थन मांगा नहीं है लेकिन जब वे जबरन समर्थन दे रहे हैं तो इसके लिए भला हम क्या कर सकते हैं ?

      जिस तरीके से बीजेपी को बिना बहुमत मिले सत्ता पर आसीन हो रही थी उससे एक बात का अंदाजा तो लगाया जा सकता था कि हो न हो शिवसेना से बदला लेने के लिए बीजेपी के नेताओं ने शरद पवार के साथ कुछ न कुछ खिचड़ी जरूर पकाई है वरना बीजेपी जैसी पार्टी अल्पमत में सरकार बनाने का कदम नहीं उठा सकती है वह भी उस समय जब पार्टी की बागडोर अमित शाह जैसे व्यक्ति संभाल रहा हो और केंद्र सरकार में नरेंद्र मोदी जैसा व्यक्ति प्रधान मंत्री हो । इन दोनों के होते हुये अल्पमत में सरकार बनाना किसी न किसी रणनीति का ही हिस्सा मानी जाएगी । इस रणनीति के पीछे बीजेपी की शायद यही मंशा रही होगी कि यदि वह एनसीपी का बाहर से समर्थन ले लेती है तो इसका दबाव शिवसेना पर पड़ेगा और शिवसेना बीजेपी के प्रति दबाव की राजनीति नहीं कर पाएगी और ऐसा हुआ भी शिवसेना के किसी भी दबाव को बीजेपी ने सिरे से खारिज कर दिया ।

      देखा जाय तो राजनीति के इस खेल में बीजेपी तथा शिवसेना को ही नुकसान हुआ । चुनाव से पहले दोनों पार्टियों में जो तल्खी आई थी वह कम तो नहीं हुई बल्कि बढ़ती चली गयी नौबत यहाँ तक आ गयी एक हिन्दुत्व वादी विचार धारा वाली दोनों पार्टियां आमने सामने आ गयी जो एक सत्ता में थी तो दूसरी विपक्ष में । शायद शरद पवार यही चाहते भी थे दो दोस्तों की राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में तीसरे व्यक्ति ने लाभ उठा लिया । शरद पवार को इन 18 -20 दिनों में भले ही कुछ न मिला हो लेकिन शिवसेना और बीजेपी में दूरियाँ बढ़ाने में और आम जनता में भाजपा की छवि को धूमिल करने में शरद पवार जरूर कामयाब हो गए ।

      इसके अलावा शरद पवार एक और राजनीतिक चाल में कामयाब हो गए वह यह कि सत्ता पाने के लिए बीजेपी भी हर दल की तरह कुछ भी कर सकती है किसी भी दल के साथ मिलकर सरकार बना सकती है भले ही वह नेशनलिश्त करप्त पार्टी (मोदी की भाषा में एनसीपी ) ही क्यूँ न हो । एनसीपी के समर्थन से ध्वनिमत से विश्वाश प्रस्ताव पास होने के बाद से शिवसेना ने भी काफी कडा रुख अपना लिया है और सत्ता में शामिल होने में कोई जल्दबाज़ी नहीं दिखा रही है । हालांकि शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को पिघलाने के लिए मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड्नविस स्वर्गीय बाल ठाकरे स्मृति दिन पर उनकी समाधि स्थल पर जाकर श्रद्धांजलि दी और उनको मनाने के लिए कुछ घोषणा भी की ,हालांकि स्वर्गीय बाल ठाकरे की समाधि स्थल पर दोनों लोगों की बात तो जरूर हुई लेकिन उसका राजनीतिक हल कुछ नहीं निकला ।

      उधर एनसीपी मुखिया शरद पवार ने अपने चिंतन शिविर में महाराष्ट्र की राजनीति में यह कहकर हलचल मचा दिया कि राज्य में बीजेपी की अल्पमत सरकार पूरे पाँच साल तक चले इसके लिए एनसीपी ने ठेका नहीं लिया है इसके साथ ही शरद पवार ने अपने कार्यकर्ताओं को मध्यावधि चुनाव तैयार रहने के लिए भी कह दिया । पवार के इस बयान से एक बात तो साफ है कि वे बीजेपी के साथ लंबी दूरी तय नहीं कर सकते है साथ ही उन्होने इस प्रकार का बयान देकर बीजेपी को ज़ोर का झटका धीरे से दे दिया है वह भी उस समय जब बीजेपी का शिवसेना के साथ सम्झौता होने के कोई आसार नहीं दिखाई दे रहे है । उधर बीजेपी द्वारा एनसीपी से समर्थन लेने की वजह से आम नागरिकों द्वारा भी आलोचना की जाने लगी है । माना जा रहा है कि बीजेपी ने जिस तरीके से छुपे तौर पर एनसीपी से समर्थन लेकर अपनी सरकार बनाई उसकी वजह से पार्टी की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होने लगे है । शाद शरद पवार की रणनीति भी यही थी कि किस तरीके से बीजेपी की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान खड़े किए जाय और लोगों के सामने इस बात को लाया जाय कि बीजेपी कहती कुछ और है और करती कुछ और है । एनसीपी मुखिया शरद पवार ने बाकायदा इसके लिए रणनीति तैयार की और बीजेपी को बहुमत न मिलने की दशा में बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी जिसे बीजेपी के नेताओं ने चुपचाप बिना खुशी दर्शाये स्वीकार भी कर लिया । शरद पवार की रणनीति के वजह से ही शिवसेना और बीजेपी के बीच की दूरियाँ बढ़ गयी जिसे पाटने का काम तो किया जा रहा है लेकिन यह काम इतना आसान भी नहीं है । आज जब एनसीपी ने इस बात की घोषणा कर दी है कि वह कभी भी बाहर से दिया हुआ समर्थन वापस ले सकती है ऐसे में बीजेपी सरकार को अल्पमत में आना तय है ।

      यदि सरकार को बचाए रखने के लिए बीजेपी नेता शिवसेना से समर्थन मांगते है जैसे कि बीजेपी नेताओं द्वारा प्रयास किए भी जा रहें है उस स्थिति में शिवसेना यदि समर्थन देने के लिए राजी हो भी जाती है तो वह अपनी शर्तों पर समर्थन देगी जो इस बात की एकदम गारंटी नहीं है शिवसेना द्वारा दिया गया समर्थन लबे समय तक चलेगा वह भी इस हालत में जब दोनों के रिश्तों में खटास चरम सीमा तक पहुँच गयी हो । हालांकि बीजेपी के नेता चाहे भले ही इस बात को स्वीकार न करे लेकिन यह बात है एकदम सही कि महाराष्ट्र की बीजेपी एनसीपी मुखिया शरद पवार के चक्र व्यूह में उलझ गयी है बीजेपी अब न तो एनसीपी से खुलकर समर्थन ले पाने की स्थिति में है और न ही शिवसेना बिना शर्त समर्थन देने के लिए तैयार होगी । ऐसी दशा में एक ही हल निकलता है वह हल है मध्यावधि चुनाव का जिसकी सीधी ज़िम्मेदारी बीजेपी पर ही आएगी क्योकि सरकार बनाते समय बीजेपी ने शिवसेना के प्रति जिस प्रकार का रुख अपनाया वह जनता से छिपा नहीं है ।  

     

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