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आखिर सम्मान जनक भागीदारी का मतलब क्या है ?


आखिर सम्मान जनक भागीदारी का मतलब क्या है ?

मनीष अस्थाना

      इस बार जब से महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव हुये हैं तब से हर पार्टी के भीतर ‘सम्मान जनक’ शब्द का बड़ी तेजी से इस्तेमाल किया जा रहा है । चुनाव से पहले सभी दल अपने साथी दलों से सम्मान जनक विधान सभा सीटें मांग रहे थे और जब सभी दलों के नेताओं को लगने लगा कि उन्हे सम्मान जनक सीटें गठबंधन के तहत नहीं मिल रही है तो उन लोगों ने अपने साथी दलों से कट्टी कर ली और अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया । सम्मान जनक सीटे मांगने वालों में सभी दल शामिल थे ,चाहे कांग्रेस हो या एनसीपी या फिर हो बीजेपी शिवसेना । महाराष्ट्र में चुनाव से पहले बीजेपी के साथ बड़े भाई के रूप में शिवसेना पेश आ रही थी और एनसीपी के साथ कांग्रेस । इन राजनीतिक दलों के बीच चुनाव से पूर्व कोई सम्मान जनक समझौता नहीं हुआ जिसकी वजह गठबंधन टूट गया ।

      राज्य में चुनाव के बाद राजनीतिक तस्वीर एकदम बदल गयी लिहाजा जब परिणाम आए तो मतदाताओं ने बीजेपी को शिवसेना का बड़ा भाई बना दिया और एनसीपी को कांग्रेस का । यानि शिवसेना की तुलना में बीजेपी को अधिक सीट मिल गईं और कांग्रेस की तुलना में एनसीपी को यह अलग बात है कि एनसीपी सिर्फ एक सीट अधिक कांग्रेस की तुलना में जीत पायी लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है बीजेपी और एनसीपी को महाराष्ट्र में बड़े भाई का दर्जा प्राप्त होने का सम्मान तो मिल गया ।

      चुनाव से पहले बीजेपी अपनी सहयोगी पार्टी शिवसेना से सम्मान जनक सीटों की मांग कर रही थी लेकिन जब चुनाव परिणाम आए तो शिवसेना बीजेपी से सत्ता में भागीदारी के लिए सम्मान जनक मंत्रिमंडल देने की मांग करने लगी । शिवसेना के नेता यह राग अलापने लगे कि जब तक शिवसेना को मंत्रिमंडल में सम्मानजनक ओहदे नहीं दिये जाते तब तक वह सत्ता में भागीदार नहीं बनेगी । शायद सम्मान जनक ओहदों का मतलब मलाई दार विभागों से था इसीलिए शिवसेना उप मुख्यमंत्री ,गृह मंत्री ,नगर विकास मंत्रालय पर अपनी नजर जमाये हुये थी । मंत्री मण्डल में इन्ही पदों को सर्वाधिक मलाईदार माना जाता है जिनको सम्मान जनक शब्द से जोड़कर देखा जाने लगा है । शायद यही कारण था कि जब बीजेपी ने इन मंत्री मंडलों को देने से मना कर दिया तो उस हालात में शिवसेना ने सत्ता में शामिल होने से इंकार कर दिया और विपक्ष में बैठने का निर्णय ले लिया ।

      जैसा कि सभी लोग जानते है कि महाराष्ट्र में बीजेपी ने अल्पमत में होने के बावजूद सरकार का गठन किया है और किसी तरह सदन में विश्वास मत हासिल कर लिया वह भी ध्वनि मत तथा शरद पवार के सहारे । इन सबके बावजूद कोई राजनीतिक दल किसी भी राजनीतिक दल के साथ बात चीत के दरवाजे नहीं बंद करता है वह चाहे एनसीपी –बीजेपी के बीच की बातचीत हो या फिर शिवसेना –बीजेपी या शिवसेना –एनसीपी के बीच की बातचीत हो ,बातचीत के दरवाजे सभी दलों के बीच हमेशा खुले रहते है और आपस में संभावनाओं की तलाश की जाती रहती है । पिछले दिनों इसी प्रकार की संभावना बीजेपी ने एनसीपी के साथ मिलकर तलाश की और महाराष्ट्र में सत्तासीन हो गए । इसके बाद जब बीजेपी के नेताओं ने देखा कि आम जनता के बीच उनकी संभावनाओं की छीछालेदार हो रही है तो फिर से एक बार शिवसेना के साथ मिलकर संभावनाओं की तलाश करने लगे भले ही वे संभावना के नाम पर विभागों की कबड्डी खेल रहे हो ?

      हालांकि सत्ता के कालीन को बचाए रखने के लिए कोई भी दल जनता के हानि लाभ के बारे में नहीं सोच रहा है । शरद पवार को उम्मीद थी यदि वे बीजेपी को पिछले दरवाजे से समर्थन दे देंगे तो अजीत पवार जैसे लोगों पर लगे घोटालों की जांच रोक दी जाएगी और राज्य में उनका सम्मान बना रहेगा शायद इसीलिए पवार ने बीजेपी सरकार को मात्र 18 दिनों में ही चेतावनी दे दी कि हम जब चाहे इस लगड़ी सरकार को गिरा सकते है । एनसीपी की इस चेतावनी के बाद एक बार फिर बीजेपी सरकार ने शिवसेना के साथ मिलकर बात चीत का दौर शुरू किया । शायद बीजेपी के नेताओं की यह धारणा रही होगी कि यदि मतदाताओं के बीच सम्मान दिलाना है तो शिवसेना का समर्थन लेना ही ठीक रहेगा । इसी कारण के चलते केंद्र सरकार के रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे से बात की और सत्ता में भागीदारी में संभावनाओं की तलाश की । हालांकि सुरेश प्रभु की यह कोशिश कितनी कारगर होगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा । लेकिन यहाँ पर भी सम्मान जनक तरीके से सत्ता में हिस्सा लेने और देने की बात जरूर की गयी ।

      अब सवाल यहाँ पर पैदा होता है कि बीजेपी को समर्थन देने के लिए शिवसेना को जिस प्रकार से सत्ता में सम्मान जनक या सीधी और सरल भाषा में मलाईदार विभाग की दरकार है क्या बीजेपी उन विभागों को शिवसेना को देगी ? शिवसेना को आशंका है कि कहीं बीजेपी उनके नव निर्वाचित विधायकों को न तोड़ ले इसी लिए अपने विधायकों को अपने साथ दौरों पर ले जाने का निर्णय लिया है अब देखना है कि बीजेपी कौन सा तरीका अपनाती है जिसके चलते दोनों का सम्मान भी बना रहे और सत्ता भी भले ही राज्य की जनता सत्ताधीशों के बारे में कुछ भी सोचे क्या फर्क पड़ता है ?

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