भीड़ के अमानवीय चेहरों का जिम्मेदार कौन ?
मनीष अस्थाना
महाराष्ट्र के पालघर जिले में भीड़ में दिखाई दिया अमानवीय चेहरों को देश अभी पूरी तरह से भूल भी नहीं पाया था कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ जिले में एक बार फिर भीड़ का अमानवीय चेहरा दिखाई दिया। पालघर या अलीगढ में घटित हुआ वह कोई पहली घटना नहीं हैं इस तरह की घटनाएं अब तो आए दिन घटित होने लगी है । कोरोना महामारी के समय देश के कई हिस्सों से इस तरह की घटनाएं सामने आयीं है जिसमें पालफर की घटना को ह्र्दय विदारक जरूर कहा जा सकता है । जिसमें दो साधुओं को भीड़ ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी ।
अक्सर कहा जाता है कि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता है लेकिन भीड़ में जिस तरीके की घटनाएं घट रही है उसके बाद भीड़ के चेहरे को अमानवीय जरूर कहा जायेगा । ऐसी घटनाएं होने के बाद जो निष्कर्ष निकाला जाता है वह यही होता है भीड़ ने जो किया वह किसी अफवाह के तहत किया । पालघर में भी जो हुआ सरकार ने यही कहा कि जहाँ यह घटना घटी उस जगह बच्चा चोर गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह फैली थी । इसके अलावा लॉक डाउन के दौरान भीड़ ने डॉक्टरों की टीम पर तथा पुलिस बल पर जिस तरीके से पथराव किया गया वहां पर या तो अफवाह फैलने की बात कही गई या फिर किसी के बहकावे में आकर ही वारदात को अंजाम दिया गया ।
हालांकि इन वारदातों की वजह कोई भी रही हो लेकिन फेलियर तो प्रशासन को माना जाना चाहिए क्योंकि कहीं न कहीं प्रशासन की नाकामी ही इसकी मुख्य वजह है । पालघर की घटना का जिम्मेदार अफवाह को माना जा रहा है सवाल उठता है कि क्या प्रशासन को इस अफवाह के बारे में जानकारी नही थी ? यदि थी तो प्रशासन ने अफवाह को दूर करने का प्रयास क्यों नहीं किया ? यदि नहीं थी तो क्यों नहीं थी ? क्या प्रशासन को इस बात की खबर नहीं रहती कि उसके आसपास क्या हो रहा है ? यदि ऐसा है तो संबंधित अधिकारियों को प्रशासन में बने रहने का कोई अधिकार नहीं ऐसे लोगों पर कार्यवाई तो होनी ही चाहिए ।
कोई भी हिंसक वारदात को करने के लिए भीड़ का सहारा लिया जाने लगा है इसकी एक बड़ी वजह है कि अभी तक माना जाता था कि भीड़ का कोई चेहरा तो होता नहीं है इसलिए हिंसक वारदात को अंजाम देकर बचा जा सकता है क्योंकि पुलिस भीड़ पर मामला दर्ज करेगी जिसमें दोषी व्यक्ति का पता लगाना मुश्किल होता है जो कि साँप भी मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती । लेकिन उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इस मिथक को तोड़ने में काफी सफलता प्राप्त की है यानि कि जो अपराध करेगा सजा उसे जरूर मिलेगी भले ही अपराधियों ने भीड़ का ही सहारा क्यों न लिया हो ।
यदि ऐसी ही कार्यवाई पालघर मामले में हो यानि कि जितने लोगों ने डंडे मारे हो , जितने लोगों के हाथों में डंडे हो सभी को हत्या का दोषी माना जाना चाहिए साथ ही प्रशासन के उन अधिकारियों को भी दोषी ठहराया जाना चाहिए जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भागीदार हो जैसे कि अफवाह को रोकने के लिए किसी तरह का प्रयास न करना, घटना स्थल पर देरी से पहुचना इत्यादि इत्यादि , ऐसे सभी लोगों को दंडित किया जाना आवश्यक है ।
अब सवाल उठता है कि भीड़ के इस हिंसक चेहरे का जवाबदार कौन है ? मेरे हिसाब से राजनीतिक पार्टियों को ही जिम्मेदार माना जाना चाहिए क्योंकि इनके आंदोलनों के दौरान जमकर हिंसा होती रही है और मामले भी दर्ज होते रहें है लेकिन कार्यवाई किसी पर नहीं होती क्योंकि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता है कार्यवाई की जाय तो किस पर ? यह एक सबसे बड़ी वजह है भीड़ के क्रूर चेहरे की ।
कोरोना महामारी के दौरान भीड़ का क्रूर चेहरा ही दिखाई दिया , लोग सोचते हैं कि भीड़ हमला करेगी, हिंसक वारदात करेगी तो कानून की पकड़ में नहीं आएगा क्योंकि वह तो भीड़ का एक हिस्सा भर था इस तरह की सोच पैदा करने वाले राजनीति से जुड़े लोग ही है जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए अभी तक भीड़ को ढाल बनाते हैं किंतु भीड़ में से हिंसक चेहरों को तलाश कर यदि कार्यवाई होती रही तो एकदिन ऐसा भी आएगा जब भीड़ का हिस्सा बनने वाले लोग हिंसा करने से बचेंगे । इसलिए जरूरी है भीड़ के बीच शामिल हिंसक चेहरों को तलाशने की और उन्हें दंड देने की ।
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