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इस अमानवीय कृत्य की निंदा करना जरूरी है


इस अमानवीय कृत्य की निंदा करना जरूरी है 
मनीष अस्थाना
पालघर जिले में जिस तरह से भीड़ ने घेरकर दो संतों की हत्या कर दी उसकी निंदा करना जितना जरूरी है उससे भी अधिक ज्यादा जरूरी है दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा देना , कड़ी सजा देना इसलिए भी जरूरी है ताकि भीड़ से निकलने वाले क्रूर और हिंसक मानसिकता रखने वालों की सोच पर विराम लगाया जा सके ।
पिछले कुछ सालों में मोबलिंचीग के मामले जिस तरीके से सामने आ रहें हैं वे चिंतनीय है । कुछ लोग भीड़ के हिंसात्मक चेहरे को सांप्रदायिक रंग देने में जुट जाते लेकिन ऐसे लोगों का कोई जाति या धर्म नहीं होता है । इसलिए इस तरह की घटनाओं की निंदा सभी धर्मों के बुद्धिजीवी वर्ग द्वारा अवश्य की जानी चाहिए । लेकिन पालघर प्रकरण में ऐसा दिखाई नहीं दे रहा है इसलिये संत समाज ने नाराजगी भी व्यक्त की है । 
इस पूरे प्रकरण में अभी तक 102 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और बाकी लोगों की तलाश की जा रही है , इस पूरे मामले की जांच सीआईडी द्वारा करायी जा रही है , पूरे प्रकरण में पुलिस के दो लोगों को निलंबित भी किया जा चुका है । यह मामला साम्प्रदायिक रंग न ले इसके लिए राज्य सरकार ने गिरफ्तार किए गए सभी लोगों के नामों की सूची तक जारी कर दी किंतु सूची जारी करने मात्र से ही सरकार अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकती है क्योंकि इस पूरे प्रकरण में प्रशासनिक नाकामी उभर कर सामने आई है । कुछ लोगों का सवाल है कि लॉक डाउन में दोनों संत निकले ही क्यों ? सवाल यह भी उठाना चाहिये कि लॉक डाउन में कोई भी व्यक्ति कांदिवली मुम्बई से वहां तक पहुंच कैसे गया क्या इस बीच किसी पुलिस वाले ने इनको जाते नहीं देखा ? यदि देखा तो उन्हें जाने क्यों दिया गया ? जबकि इन संतों के पास सूरत जाने के लिए कोई सरकारी अनुमति पत्र भी नहीं था । इसका सीधा सा मतलब है पुलिस प्रशासन लॉक डाउन के समय मुस्तैद नही था यदि होता तो यह लोग मुम्बई सीमा के बाहर भी नहीं जा पाते यदि मुम्बई से यह लोग निकल भी गए थे तो क्या मुम्बई पालघर के बीच कहीं भी इनके वाहन को रोकने का प्रयास नहीं किया गया क्या रास्ते में इनके वाहन को जांच का सामना नहीं करना पड़ा जबकि पूरे राज्य में जिला हद बंदी कानून लागू था , कहीं न कहीं इसमें प्रशासन की भी  घोर लापरवाही ही कही जाएगी । 
यहां सोचने लायक बात है कि जब कुछ समय पहले एक धर्म विशेष के युवकों को भीड़ ने इसी तरह मार था तो तमाम धर्म निरपेक्ष बुद्धिजीवी आलो आलोचना करने में जुट गए लेकिन इस घटना की निंदा किसी ने नहीं की उलट यह सवाल किए जाने लगे कि देखा संतों की हत्या हिन्दू भीड़ ने ही की है । किंतु सच तो यही है कि हत्या हुई और भीड़ द्वारा की गई है जिसे किसी भी कीमत पर सही नहीं ठहराया जा सकता है , ठहराया भी नहीं जाना चाहिए ।
कुछ लोग राजनीति के वैचारिक मतभेदों के चलते सोचने का काम कर रहें है अपने आप को धर्मनिरपेक्ष मानने वाले भाजपा या मोदी विरोधी लोग यह सोचकर खुश है इस हत्याकांड में हिन्दू ही शामिल है । लेकिन यह इस तरह की सोच रखने का वक्त नहीं है क्योंकि अब इस सोच के साथ लोग भीड़ जुटाकर हिंसक कृत्य करते है कि उनके खिलाफ ठोस कानूनी कार्यवाई नहीं हो सकती है । मुस्लिम धर्म की भीड़ में जमा हुए लोग भी यही सोचते है और हिन्दू धर्म की भीड़ में भी यही मानसिकता तेजी से पनप रही है , इसलिए इस तरह की मानसिकता को ही खत्म करने की आवश्यकता है और यह मानसिकता खत्म होगी दोनों धर्मों के लोगों द्वारा निंदा करने से जब दोनों धर्मों के लोगों द्वारा समान रूप से नींद की जाएगी तभी इस तरह की सोच पर लगाम लग सकेगी । इसलिये ऐसे कृत्यों की निंदा करना बेहद जरूरी है और की जानी चाहिए ।

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