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महाधिवेसन के बहाने

मनीष अस्थाना कुछ दिनों पहले कांग्रेस ने अपनी १२५ वें साल पुरे होने पर महाधिवेसन का आयोजन किया था , इस महाधिवेसन का आयोंजन दिल्ली में किया गया था । इस अधिवेसन के दोरान जहाँ एक तरफ कांग्रेसी नेताओं के चेहरों पर खुसी दिखाई दे रही तो दुसरी तरफ सीत सत्र के समय विरोधी दलों द्वरा लगाये गए भ्रस्टाचार के आरोपों के टीस भी दिखाई दे रही थी जिसे उनके चेहरों पर साफ पढ़ा जा सकता था, चाहे वह सोनिया गाँधी हो या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हो या फिर कोई दूसरा नेता हो। कांग्रेस के बड़े नेता इस बात को अच्छी तरह से जानते थे की इस सरकार के समय जो भ्रस्टाचार हुआ है उसकी वजह से पार्टी की छवि भी ख़राब हुई है जिसका असर पार्टी के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ा है पार्टी ने अधिवेसन के दोरान उस छवि को भी सुधारने का प्रयास यह कह कर किया की उनकी पार्टी ने तो अपने नेताओं पर तो कार्यवाई की लेकिन बीजेपी ने अपने नेताओं पर किसी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की , इसका सीधा सा मतलब लगाया जा सकता है की अपने चहरे का दाग छिपाने के लिए यह दिखाना की देखो उसके चहरे पर भी तो दाग लगा है, पहले अपने चेहरे का दाग साफ करो फिर दुसरे का दाग दिख...

भीड़ के अमानवीय चेहरों का जिम्मेदार कौन ?

भीड़ के अमानवीय चेहरों का जिम्मेदार कौन ? मनीष अस्थाना महाराष्ट्र के पालघर जिले में भीड़ में दिखाई दिया अमानवीय चेहरों को देश अभी पूरी तरह से भूल भी नहीं पाया था कि उत्तर प्रदेश के अलीगढ जिले में एक बार फिर भीड़ का अमानवीय चेहरा दिखाई दिया। पालघर या अलीगढ में  घटित हुआ वह कोई पहली घटना नहीं हैं इस तरह की घटनाएं अब तो आए दिन घटित होने लगी है । कोरोना महामारी के समय देश के कई हिस्सों से इस तरह की घटनाएं सामने आयीं है जिसमें पालफर की घटना को ह्र्दय विदारक जरूर कहा जा सकता है । जिसमें दो साधुओं को भीड़ ने निर्मम तरीके से हत्या कर दी । अक्सर कहा जाता है कि भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता है लेकिन भीड़ में जिस तरीके की घटनाएं घट रही है उसके बाद भीड़ के चेहरे को अमानवीय जरूर कहा जायेगा । ऐसी घटनाएं होने के बाद जो निष्कर्ष निकाला जाता है वह यही होता है भीड़ ने जो किया वह किसी अफवाह के तहत किया । पालघर में भी जो हुआ सरकार ने यही कहा कि जहाँ यह घटना घटी उस जगह बच्चा चोर गिरोह के सक्रिय होने की अफवाह फैली थी । इसके अलावा लॉक डाउन के दौरान भीड़ ने डॉक्टरों की टीम पर तथा पुलिस ब...

सिर्फ सत्ता सुख है नेताओं की विचारधारा

  सिर्फ सत्ता सुख ही है नेताओं की विचारधारा मनीष अस्थाना चुनाव आते ही राजनीतिक दलों में बड़ी उठापटक शुरू हो जाती है , बात जब सत्ता सुख की आती है तब हर नेता के समक्ष पार्टी की विचारधारा बौनी साबित हो जाती है। यह बात किसी एक नेता पर नहीं बल्कि देश के अधिकांश नेताओं पर लागू होती है। कुछ दिनों बाद महाराष्ट्र में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं यहां पर कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस भाजपा और शिवसेना में शामिल हो रहें हैं इसमें से कई लोग तो ऐसे है जो शिवसेना और भाजपा को दिन रात पानी पी - पी कर कोसते दिखाई देते थे , जो लोग कभी विचारों की दुहाई देते थे आज उन्ही लोगों को अपनी उसी विचारधारा का जहाज डूबता दिखाई देने लगा है ऐसे लोग अब उस जहाज की सवारी करना चाह रहें जो पानी की सतह से दो फ़ीट ऊँचा चलता दिखाई दे रहा है। यह लोग अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए किसी भी स्तर तक जाते हुए दिखाई दे रहें हैं।  यह बात सिर्फ महाराष्ट्र के नेताओं पर ही लागू नहीं होती है बल्कि उन राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है जो मौका परस्ती के चलते सिर्फ अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। अभी लोकसभा चुनाव ...