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दलित अब कहाँ रहे अछूत


दलित अब अछूत कहाँ रहें
सिर्फ वोट बैंक के लिए हो रही है राजनीति
मनीष अस्थाना
देश मे जो लोग वोट बैंक पक्का करने के लिए दलित के नाम की राजनीति कर रहें है उन्हें यह बात समझ लेना चाहिए कि दलित अब अछूत नहीं रहें एक समय था जब सवर्ण लोग दलितों को अछूत मानते थे और उनके यहां पानी पीने तक नहीं पीते थे लेकिन अब ऐसा नही है दलित और सवर्ण एक साथ काम करते है और एक मेज पर बैठकर खाना भी कहते है हां देश के नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिए दलित समाज को बाकी के लोगों से अलग कर रखा है दलित समाज के जो लोग पिछड़े हैं और गरीब भी है जो इन नेताओं की राजनीति नहीं समझते हैं उनके मन मे जहर घोलने का काम करते रहते है उन्हें लगातार इस बात का आभाष दिलाते रहतें है कि वे एक समाज का हिस्सा है जिसे पिछड़ा माना जाता है वे बाकी से अलग है ।
दलित समाज के मन मे सबसे अधिक जहर घोलने का काम दलित नेता ही करते है । अपने आप को दलित समाज का हितैषी कहने वाली मायावती ने दलित मतदाताओं के बल पर सत्ता के शीर्ष पर पहुंच गई वे उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनी लेकिन गरीब दलितों का उत्थान नहीं कर पाई । आज जिस तरीके अमीर और गरीब सवर्ण है उसी तरह दलित समाज में अमीर गरीब है । निस तरह से सवर्ण म् कुछ लोग करोड़पति उसी तरह दलित समाज में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो करोड़पति है यह दलित करोड़पति सवर्ण करोड़पतियों की तरह ही अपने लिए ही जीतें है उन्हें समाज की गरीबी से कोई वास्ता नहीं होता है ।
इन दिनों अपना दलित प्रेम दिखाने के लिए भाजपाई नेता दलितों के घर खाना खा रहे है इससे पहले वर्तमान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने भी दलित समाज के एक गरीब व्यक्ति के घर जाकर खाना खाया था उस समय भी काफी हो हल्ला मचा था और इस बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक गरीब दलित के घर में खाना खाया तो फिर से वही हो हल्ला मचा ।
सबसे पहले इस पर बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने सवाल उठाए , जहां तक मेरी जानकारी है कि मायावती भी एक दलित परिवार से है और उनके घर आये दिन ब्राम्हण तक खाना खाते रहते है उनकी सबसे बड़े हितैसी और उनके करीबी ब्राम्हण ही है इसके अलावा कई पंडित ठाकुर बनिया उन्हीं की पार्टी के कार्यकर्ता है जो समय असमय उनके घर का बना हुआ खाना खाते रहें होने यह अलग बात है कि उनका घर बंगले की श्रेणी में आता है जहां पर लोग भोजन करना अपना भाग्य समझते होंगें ।
मायावती की ही तरह राम विलास पासवान , रामदास आठवले जैसे कई नेता दलित समाज से ही है जिनके साथ सवर्ण खाना खाते हैं , इन नेताओं समेत जो भी ब्यूरोक्रेट्स , अधिकारी व अन्य धनिक दलित वर्ग से आतें है वे किसी भी नजरिये से अछूत दिखाई नहीं देते हैं हां इतना जरूर है कि समाज के पिछड़ों को ही दलित कहा जाता है इस तरह के गरीब सवर्णों में भी देखने को मिलतें हैं आज गरीब सवर्ण को भी दो वक्त का खाना बड़ी मुश्किल से मिल पाता है , दलित समाज के साथ साथ कई सवर्ण जातियों के लोग भी उनके जैसा काम करते दिखाई दे जाते हैं । आज के दौर में कई सवर्ण ऐसे दिखाई देंगे जो चाय या खान पान की दुकान खोल रखी है जिनके यहां दलित समाज के लोग भी उसी बरतन में खाना खातें हैं जिसमें सवर्णों को परोसा जाता कई जगहों पर ऐसे ब्राम्हण परिवार से लोग मिल जाएंगे जो चाय की दुक्सन चलाते हैं वो लोग चाय पीने वाले उसकी न तो जाती पूछते हैं और न ही धर्म बल्कि उनके जूठे बरतन भी बिना किसी संकोच के साफ करते हैं ।
हकीकत में देखा जाय तो छूत अछूत , दलित सवर्ण का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है , यह शब्द सिर्फ वोट बैंक की राजनीति के लिए ही इस्तेमाल किया जाता है क्योकि हर किसी को अपना वोट बैंक की पड़ी है न कि किसी समाज के उत्थान की ।

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